Wednesday, 8 February 2012

उज्जैन दर्शन-2

इस श्रंखला के भाग 3 में मैंने आपको अपने उज्जैन भ्रमण के दौरान दर्शन किये गए संदीपनी आश्रम, श्री हरसिद्धि मंदिर, श्री गढ़ कालिका मंदिर, श्री काल भैरव एवं श्री मंगलनाथ के बारे में जानकारी दी थी, अब इस भाग 4 (अंतिम भाग) में मैं आपको मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी, श्री गोपाल मंदिर, श्री भ्रताहरी गुफा, श्री सिद्धवट, श्री बड़े गणेश एवं श्री चारधाम मंदिर के बारे में जानकारी देने का प्रयास करूँगा.
मोक्षदायिनी शिप्रा (क्षिप्रा) नदी:
श्री हरसिद्धि मंदिर के पीछे कुछ ही दुरी पर क्षिप्रा नदी है. उज्जैन इस पवित्र नदी के पूर्वी छोर पर बसा हुआ है. इसके तट पर अनेक ऋषि मुनियों ने साधना की है. स्कन्द पूरण में कहा गया है की सारे भूमंडल पर शिप्रा के सामान कोई दूसरी नदी नहीं है, जिसके तट पर क्षण भर खड़े रह जाने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है. इसके पावन तट पर महँ सिंहस्थ (कुम्भ मेला) के अलावा सोमवती -श्रीशनिश्चरी अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा व ग्रहण आदि पर्वों पर लाखों नर नारी स्नान करके पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं. क्षिप्रा महासभा द्वारा प्रतिदिन गोधुली बेला में क्षिप्रा की महा आरती की जाती है.

क्षिप्रा नदी तट (रामघाट)


क्षिप्रा स्नान (रामघाट)
श्री गोपाल मंदिर:
इस मंदिर का निर्माण महाराजा श्री दौलतराव सिंधिया की महारानी बायजाबाई द्वारा लगभग ढाई सौ साल पहले करवाया गया था. नगर के मध्य में स्थित इस मंदिर श्री द्वारकाधीश की प्रतिमा है, अतः इसे द्वारकाधीश श्री गोपाल मंदिर भी कहा जाता है. मंदिर के गर्भगृह में लगा रत्नजडित द्वार श्रीमंत सिंधिया ने गजनी से प्राप्त किया था, जो सोमनाथ की लूट में वहां पहुँच गया था. मंदिर का शिखर सफ़ेद संगमरमर तथा शेष मंदिर सुन्दर काले पत्थरों से निर्मित है. मंदिर का प्रांगण और परिक्रमा पथ भव्य और विशाल है. जन्माष्टमी यहाँ का विशेष पर्व है. बैकुंठ चौदस के दिन श्री महाकाल की सवारी हरिहर मिलन हेतु मध्यरात्रि में यहाँ आती है तथा भस्म आरती के समय श्री गोपाल कृष्ण की सवारी महाकालेश्वर जाती है और वहां तुलसीदल अर्पित किया जाता है.

श्री द्वारकाधीश गोपाल मंदिर

गोपाल मंदिर के सामने बाज़ार

गोपाल मंदिर के सामने बाज़ार

गोपाल मंदिर

गोपाल मंदिर
श्री भृतहरी गुफा:
सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भृतहरी की तपस्या स्थली भृतहरी गुफा के नाम से प्रसिद्द है. राज्य त्यागने के बाद उन्होंने नाथ पंथ की दीक्षा लेकर इसी स्थान पर योग साधना की थी. क्षिप्रा तट पर स्थित यह प्राचीन गुफा बौद्धकालीन व परमारकालीन स्थापत्य की रचना है. गुफा का प्रवेश मार्ग संकरा है. जन भावना के अनुसार नाथ संप्रदाय के दो प्रमुख गुरु गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ का भी इन गुफाओं से सम्बन्ध माना जाता है. गोरखनाथ की अखंड धुनी आज भी यहाँ प्रज्जवलित है. यहाँ के शिल्प में शैव उपासना तथा भैरवी उपासना के प्रमाण विद्यमान हैं. पूर्वी गुफा तथा उसके अलंकृत स्तम्भ किसी प्राचीन शिव मंदिर के अंश प्रतीत होते हैं.

श्री भृतहरी गुफा प्रवेश द्वार

श्री भृतहरी गुफा का आतंरिक द्रश्य
श्री सिद्धवट:
तीर्थ स्थली उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित सिद्धवट का वही महत्त्व है जो गया तथा प्रयाग में अक्षयवट का है. स्कंद्पुरण के अवन्तिखंड में वर्णन है की देवाधिदेव महादेव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करने के बाद अपनी शक्ति यहाँ शिप्रा में फेंकी थी जो पाताल में चली गई इसलिए इसे शक्तिभेद तीर्थ भी कहते हैं. जगत्जननी माता पारवती ने इसी वाट के निचे अपने प्रिय पुत्र कार्तिकेय को भोजन कराया था. भगवान् शिव ने वट वृक्ष आशीर्वाद दिया की तुम संसार में कल्प के रूप में जाने जाओ. सम्राट विक्रमादित्य ने यहाँ तपस्या करके अग्या बेताल की सिद्धि की थी. इस मंदिर में स्थित शिवलिंग (पतालिश्वर) का लिंग जलधारी की सतह से निचे है. कहा जाता है की जैसे जैसे प्रथ्वी पर पाप बढ़ता है यह धंसता चला जाता है. मंदिर क्षिप्रा के तट पर ही है जहाँ पक्के घाट बने हुए हैं.मुग़ल शासकों ने इस वृक्ष को कटवा कर लोहे के तवे मढवा दिए थे, पर उन लौह पत्रों को छेड़ कर वृक्ष पुनः हरा भरा हो गया.

श्री सिद्धवट
श्री बड़े गणेश :
श्री महाकालेश्वर प्रवचन हॉल के सामने स्थित मंदिर में श्री गणेश जी की भव्य और मनोहारी विशाल मूर्ति है. यह स्थान महर्षि संदीपनी के वंशज प्रसिद्द ज्योतिषी पंडित श्री नारायण जी व्यास की आराधना स्थली रहा है, और उन्ही के द्वारा स्थापित किया गया था. संस्कृत तथा ज्योतिष के केंद्र बने इस स्थान से हजारों छात्रों ने ज्ञानार्जन कर भारतवर्ष में सम्मान प्राप्त किया. इनके नाम से निकलने वाले ‘श्री नारायण विजय’ पंचांग का कार्यालय भी समीप ही है.मंदिर के मध्य में श्री पंचमुखी हनुमान जी की सुन्दर प्रतिमा है. अन्दर पश्चिमी भाग में नवग्रहों की मर्तियाँ हैं.इसके अतिरिक्त और भी कई सुन्दर और प्राचीन दर्शनीय प्रतिमाएं यहाँ स्थापित हैं.

श्री बड़े गणेश

श्री बड़े गणेश मंदिर में स्थित श्री पंचमुखी हनुमान murti
श्री चारधाम मंदिर:
यह मंदिर श्री हरसिद्धि देवी के मंदिर की दक्षिण दिशा में थोड़ी सी दुरी पर है. इस मंदिर में श्री आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित हिन्दू धर्म के चारधामों की सजीव झांकियां स्थापित की गयी हैं. प्रतिमाओं को मूल स्वरुप जैसा ही बनाया गया है. एक ही स्थान पर चारों धाम दर्शन की सुन्दर कल्पना यह मंदिर साकार करता है. मंदिर में प्रवेश स्थान पर एक सुन्दर बगीचा है जिससे मंदिर का सौंदर्य द्विगुणित होता है. इस मंदिर के पार्श्व भाग में अन्य देवी देवताओं की सजीव तथा मनमोहन झांकियां भी स्थापित की गयी हैं जिन्हें देखकर मन प्रसन्न हो जाता है.

श्री चारधाम मंदिर में स्थापित श्री रामेश्वरम धाम

श्री चारधाम मंदिर

श्री चारधाम मंदिर में स्थापित श्री बद्रीनाथ धाम

श्री चारधाम मंदिर में स्थापित एक अन्य झांकी

श्री चारधाम मंदिर के सामने पूजन सामग्री के साथ बाल भक्त वेदांत
और इस तरह से महाकाल की नगरी के दर्शन करके, उज्जैन की बहुत सारी मधुर स्मृतियाँ अपने दिलों में बसा कर श्री महाकालेश्वर से अगली बार जल्दी ही बुलाने का निवेदन करके हमने इस स्वप्ननगरी से प्रस्थान कर दिया. इस श्रंखला के लिए बस इतना ही, फिर मिलेंगे ऐसी ही किसी सुखद यात्रा के बाद. तब तक के लिए बाय बाय.

Tuesday, 7 February 2012

उज्जैन दर्शन

इस श्रंखला की पिछली कड़ी में मैंने आपको श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग तथा महाकालेश्वर मंदिर के बारे में जानकारी दी थी. आइये इस तीसरी कड़ी में मैं आपको परिचित करता हूँ उज्जैन के अन्य दर्शनीय स्थलों से. अपने उज्जैन प्रवास के दुसरे दिन याने 11 .11 .11 को सुबह भगवान् महाकालेश्वर के दर्शन करने के पश्चात अब हमारा अगला कार्यक्रम था उज्जैन भ्रमण. चूँकि हमें उज्जैन के दर्शनीय स्थलों के रास्तों तथा दूरियों की अधिक जानकारी नहीं थी अतः हमने यह निर्णय लिया की अपनी कार को पार्किंग में ही खड़ी करके ऑटो रिक्शा के द्वारा ही उज्जैन भ्रमण किया जाए. 250 रुपये में ऑटो तय करके हम उज्जैन भ्रमण की ओर निकल गए.

उज्जैन दर्शन


उज्जैन भ्रमण के लिए ऑटो रिक्शा
वैसे उज्जैन दर्शन के लिए पर्यटन विभाग की बस सुविधा भी उपलब्ध है जो की प्रति व्यक्ति 37 रु. के शुल्क पर उज्जैन के प्रमुख स्थलों की सैर कराती है. उज्जैन दर्शन के लिए बस, देवास गेट से प्रातः 7 बजे एवं दोपहर में 2 बजे चलती है. इसके अतिरिक्त टेम्पो, ऑटो रिक्शा, टाटा मेजिक आदि वाहनों से भी उज्जैन भ्रमण किया जा सकता है.
उज्जैन के प्रमुख दर्शनीय स्थल : उज्जैन के प्रमुख दर्शनीय स्थल निम्नानुसार हैं -
श्री महाकालेश्वर मंदिर, श्री बड़े गणेश मंदिर, श्री हरसिद्धि मंदिर, श्री चारधाम मंदिर, श्री नवगृह मंदिर, श्री प्रशांति धाम, श्री राम जनार्दन मंदिर, श्री गोपाल मंदिर, श्री गढ़ कालिका मंदिर, श्री चिंतामन गणेश, श्री काल भैरव, श्री भ्रतहरी गुफा, श्री सिद्धवट, श्री मंगलनाथ मंदिर, श्री संदीपनी आश्रम, वेधशाला, श्री चौबीस खम्भा मंदिर, शिप्रा नदी, कलियादेह पेलेस एवं इस्कोन मंदिर.
चूँकि हमारे पास समय की कमी होने की वजह से हम यह सारे मंदिर तो नहीं देख पाए लेकिन इनमें से अधिकतर स्थलों का अवलोकन करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ जिनका वर्णन करना मैं आवश्यक समझता हूँ.
श्री सांदीपनी आश्रम:
महर्षि सांदीपनी व्यास के इस आश्रम में भगवान् श्री कृष्ण, सुदामा तथा श्री बलराम ने गुरुकुल परंपरा के अनुसार विद्याध्ययन कर चौसठ कलाएं सीखीं थीं. उस समय तक्षशिला तथा नालंदा की तरह अवन्ती भी ज्ञान विज्ञान और संस्कृति का केंद्र थी. भगवान् श्री कृष्ण यहाँ स्लेट पर लिखे अंक धो कर मिटाते थे इसीलिए इसे अंकपात भी कहा जाता है. श्री मद्भागवत, महाभारत तथा अन्य कई पुरानों में यहाँ का वर्णन है. यहाँ स्थित कुंड में भगवान् श्री कृष्ण ने गुरूजी को स्नानार्थ गोमती नदी का जल सुगम कराया था इसलिए यह सरोवर गोमती कुंड कहलाया. यहाँ मंदिर में श्री कृष्ण, बलराम और सुदामा की मूर्तियाँ हैं. महर्षि सांदीपनी के वंशज आज भी उज्जैन में हैं तथा देश के प्रख्यात ज्योतिर्विदों के रूप में जाने जाते हैं. उत्खनन में इस क्षेत्र से चार हज़ार वर्ष से ज्यादा पुराने पाषाण अवशेष मिले हैं.

सांदीपनी आश्रम का प्रवेश द्वार

भगवान कृष्ण, बलराम तथा सुदामा की विद्यास्थली
श्री सर्वेश्वर महादेव मंदिर:
संदीपनी आश्रम परिसर में स्थित श्री सर्वेश्वर महादेव मंदिर में 6000 वर्ष पुराना शिवलिंग स्थापित है जिसे महर्षि संदीपनी ने बिल्व पत्र से उत्पन्न किया था. इस शिवलिंग की जलाधारी में पत्थर के शेषनाग के दर्शन होते हैं जो प्रायः पुरे भारत वर्ष में दुर्लभ है.

संदीपनी आश्रम में स्थित 6000 वर्ष प्राचीन श्री सर्वेश्वर महादेव शिवलिंग
श्री हरसिद्धि मंदिर:
उज्जैन के पावन दर्शनीय स्थलों में श्री हरसिद्धि मंदिर का अपना एक विशिष्ठ स्थान है. महालक्ष्मी तथा महासरस्वती माता की मूर्तियों के मध्य में स्थित माँ अन्नपूर्ण की मूर्ति गहरे सिंदूरी रंग में शोभायमान है. श्री यन्त्र जो की शक्ति का प्रतिक है, भी मंदिर में स्थित है. शिव पुराण के अनुसार जब भगवान शिव, सती माता के जलते हुए शरीर को प्रजापति दक्ष के हवन कुंड से उठा कर लेकर जा रहे थे तो रास्ते में जहाँ जहाँ उनके शरीर के अंग गिरे वहां एक शक्ति पीठ स्थापित हो गया, उन्ही शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है श्री हरसिद्धि मंदिर जहाँ माता पार्वती की भुजाएं गिरी थीं. यह मंदिर मराठा काल में पुनर्निर्मित हुआ था, मंदिर के सामने दो दीप स्तम्भ, मराठा कला की विशिष्ठ पहचान है. मंदिर परिसर में एक अति प्राचीन कुवां स्थित है.

श्री हरसिद्धि मंदिर शक्तिपीठ

श्री माँ हरसिद्धि दर्शन
श्री गढ़कालिका मंदिर:
गढ़कालिका देवी महाकवि कालिदास की आराध्य देवी रही है. इनकी कृपा से ही अल्पज्ञानी कालिदास को विद्वता प्राप्त हुई थी. यह तांत्रिक सिद्ध स्थान है. यह मंदिर जिस जगह पर है, वहां पर पुरानी अवंतिका बसी हुई थी. गढ़ की देवी होने से यह गढ़कालिका कहलाई. मंदिर में माता कालिका के एक तरफ महालक्ष्मी तथा दूसरी तरफ श्री महासरस्वती की प्रतिमाएं हैं. मंदिर के पीछे श्री गणेश जी की पौराणिक प्रतिमा है तथा सामने पुरातन श्री हनुमान मंदिर है जिसके पास ही दर्शनीय श्री विष्णु प्रतिमा है. कुछ दुरी पर क्षिप्रा नदी है जहाँ सतियों का स्थान है.

श्री गढ़ कालिका मंदिर

श्री माँ गढ़ कालिका दर्शन
श्री काल भैरव:
अष्टभैरवों में श्री काल भैरव का यह मंदिर बहुत प्राचीन और चमत्कारिक है. इस मंदिर की प्रसिद्धि इस बात के लिए है विशेष है की मुंह में छेद नहीं है फिर भी भैरव की यह प्रतिमा मदिरापान करती है. पुजारी द्वारा मद्यपात्र काल भैरव के मुंह में लगाया जाता है और देखते ही देखते यह खाली हो जाता है. स्कन्द पूरण में इन्ही काल भैरव का अवन्ती खंड में वर्णन मिलता है. इनके नाम से ही यह क्षेत्र भैरवगढ़ कहलाता है. रजा भद्रसेन द्वारा इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था. उसके भग्न होने पर राजा जय सिंह द्वारा वर्त्तमान मंदिर का निर्माण करवाया गया. प्रांगण में संकरी तथा गहरी गुफा में पाताल भैरवी का मंदिर है. काल भैरव के मंदिर के सामने जो मार्ग है इससे आगे बढ़ने पर प्राचीन विक्रांत भैरव मंदिर पहुंचा जा सकता है.यह दोनों स्थान तांत्रिक उपासकों के लिए सिद्ध स्थान के रूप में प्रसिद्ध है. शिव पुराण तथा तंत्र ग्रंथों के अनुसार शिव तथा भैरव एक ही है. अतः शिव की नगरी में उन्ही के रुद्रावतार का यह स्थान बड़े महत्व का है.

श्री काल भैरव मंदिर

श्री काल भैरव

श्री मंगलनाथ:
यह उज्जैन का एक महत्वपूर्ण तथा महिमावान स्थान है. पौराणिक मान्यता है की मंगलनाथ की जन्मभूमि यहीं है. इनकी आराधना तथा पूजन विशेष रूप से मंगल गृह की शांति, शिव कृपा, ऋण मुक्ति और धन प्राप्ति आदि की कामना से की जाती है. मंगलनाथ की भात पूजा तथा रुद्राभिषेक का बहुत महत्व है. यहाँ पर मंगल की पूजा शिवलिंग के रूप में की जाती है. मंगलवार को इनके दर्शनार्थियों की संख्या बहुत बढ़ जाती है.
मंदिर एक ऊँचे टीले पर बना हुआ है. मंदिर प्रांगण में ही प्रथ्वी देवी की एक बहुत प्राचीन प्रतिमा स्थापित है. शक्ति स्वरुप होने से इनको सिन्दूर का चोला चढ़ाया जाता है. मंगलनाथ के साथ ही इनके दर्शन का भी महत्व है. मंदिर क्षिप्रा तट पर स्थित है यहाँ पर पक्के घाट बने हुए है. श्री मंगलनाथ से थोड़ी दुरी पर गंगा घाट है जहाँ पर भगवान् श्री कृष्ण ने अपने गुरु संदीपनी जी की गंगा स्नान की अभिलाषा पूर्ण कराने के लिए गंगा प्रकट कराई थी.

श्री मंगलनाथ मंदिर

श्री मंगलनाथ मंदिर

श्री मंगलनाथ मंदिर परिसर में पवित्र पीपल वृक्ष

श्री मंगलनाथ मंदिर शिवलिंग

भगवान नन्दीश्वर के कान में अपनी अभिलाषा व्यक्त करते संस्कृति तथा वेदांत
श्रंखला के इस भाग को अब मैं यहीं विराम देता हूँ. अगले एवं अंतिम भाग में मैं आपको पवित्र नगरी उज्जैन के कुछ अन्य महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों के बारे में जानकारी दूंगा. तब तक के लिए बाय…..

उज्जैन – महाकाल की महिमा

उज्जैन देवास यात्रा की श्रंखला की पिछली कड़ी में मैंने आपको देवास में स्थित कैला माता मंदिर, तुलजा भवानी तथा चामुंडा माता टेकरी के बारे में बताया था. आइये अब इस कड़ी में हम चलते हैं महातीर्थ उज्जैन तथा जानते हैं महाकाल की महिमा के बारे में और करते हैं दर्शन महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के सर्वप्रथम भगवान् महाकाल के श्री चरणों में मेरा कोटि कोटि वंदन.
Shivling
जय महाकाल
उज्जैन के बारे में: उज्जैन मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन नगर है जो की क्षिप्रा नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित है. प्राचीन समय में इसे उज्जयिनी कहा जाता था. जैसा की महाभारत ग्रन्थ में वर्णित है उज्जयिनिं नगर अवन्ती राज्य की राजधानी था. उज्जैन हिन्दू धर्म की सात पवित्र तथा मोक्षदायिनी नगरियों में से एक है (अन्य छः मोक्षदायिनी नगरियाँ हैं – अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, हरिद्वार, द्वारका एवं कांचीपुरम). यहाँ हिन्दुओं का पवित्र उत्सव कुम्भ मेला 12 वर्षों में एक बार लगता है.

उज्जयिनी, शिक्षा का एक प्राचीन स्थल भी था जहाँ गुरुकुलों में कला एवं विज्ञान तथा वेदों का ज्ञान दिया जाता था. भगवान् श्री कृष्ण ने अपने भ्राता बलराम तथा सखा सुदामा के साथ यहाँ के संदीपनी आश्रम गुरुकुल में अध्ययन किया था. यह हिन्दू समय-निर्धारण का केंद्र भी है. उत्तर में 23 डिग्री 11 मिनट तथा पूर्व में 73 डिग्री 45 मिनट पर स्थित होने के कारण हिन्दू खगोलीय ग्रन्थ के अनुसार मुख्य भूमध्य रेखा अथवा शुन्य देशांतर रेखा उज्जैन से गुजरती है, इसलिए समय की गणना उज्जैन में सूर्योदय के द्वारा की जाती है और तदनुसार, कैलेण्डर वर्ष के आरंभ ‘मकर संक्रांति’ तथा युग के प्रारंभ की गणना इससे की जाती है.
यहीं पर भगवान् शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक तथा अति पावन श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग विद्यमान है. इस नगरी का पौराणिक तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व सर्वज्ञात है. जहाँ महाकाल स्थित है वहीँ पर प्रथ्वी का नाभि स्थान है, बताया जाता है की वही धरा का केंद्र है. उज्जैन की पावन धरा पर ही माँ शक्ति के 51 शक्तिपीठों में से एक मां हरसिद्धि का मंदिर भी स्थित है.
सामान्य तौर पर एक नगर के लिए मंदिर बनाया जाता है लेकिन मंदिरों की वजह से नगर का बसाया जाना विरल ही होता है लेकिन उज्जैन में मंदिरों की संख्या को देखते हुए यही कहा जा सकता है की इस नगर को मंदिरों के लिए ही बसाया गया है. यहाँ के सैकड़ों मंदिरों की स्वर्ण चोटियों को देखकर इस नगर को प्राचीन समय में स्वर्नश्रंगा भी कहा जाता था.
मोक्षदायक सप्तपुरियों में से एक इस उज्जैन नगर में 7 सागर तीर्थ, 28 तीर्थ, 84 सिद्धलिंग, 30 शिवलिंग, अष्ट (8)भैरव, एकादश (11) रुद्रस्थान, सैकड़ों देवताओं के मंदिर, जलकुंड तथा स्मारक है. ऐसा प्रतीत होता है की 33 करोड़ देवी देवताओं की इन्द्रपुरी इस उज्जैन नगर में बसी हुई है.
नाभिदेशो महाकाल्स्त्नामना तत्र वै हर – वराह पुराण के इस वर्णन के अतिरिक्त अन्य पुराणों, ग्रंथों, शास्त्रों में भी उज्जैन के धार्मिक महत्व का वर्णन है. समस्त मृत्युलोक के स्वामी और काल गणना के अधिपति श्री महाकालेश्वर का निवास स्थान होने की वजह इस तीर्थ का महत्व औरों से अधिक है.
कैसे पहुंचें:
1 . सड़क मार्ग – इंदौर, सूरत, ग्वालियर, पुणे, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, उदयपुर
, नासिक मथुरा आदि शहरों से उज्जैन सड़क मार्ग द्वारा जुडा है.
2 . रेल मार्ग – अहमदाबाद, राजकोट, मुंबई, लखनऊ, देहरादून, दिल्ली, वाराणसी, चेन्नई, बंगलुरु, हैदराबाद,जयपुर,हावड़ा आदि शहरों से उज्जैन रेलमार्ग द्वारा जुड़ा है.
3 . वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा इंदौर (53 km ) है जहाँ से मुंबई, दिल्ली, ग्वालियर आदि
शहरों के लिए विमान सेवाएँ उपलब्ध हैं.
ठहरने के लिए धर्मशाला तथा अन्य जानकारी के लिए संपर्क किया जा सकता है:
श्री महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन
admin@mahakaaleshwar .nic .in
www.mahakaleshwar.nic.in
फ़ोन: 0734 – 2550563
धर्मशाला: 0734 – 2551714
तो यह था एक संक्षिप्त परिचय पावन नगरी उज्जैन से, अब हम चलते हैं अपने यात्रा वृत्तान्त की ओर.
दिनांक 10.11.11 को देवास से शाम करीब 6 :30 बजे हमने उज्जैन के लिए प्रस्थान किया तथा लगभग 8 बजे हम उज्जैन पहुँच गए. उज्जैन पहुँच कर हमने अपनी गाड़ी मंदिर के समीप ही स्थित पार्किंग में पार्क की तथा अब हमारी पहली प्राथमिकता थी रहने के लिया एक अदद कमरे की तलाश.

पार्किंग स्थल से महाकालेश्वर मंदिर की एक झलक
श्री महाकालेश्वर मंदिर संस्थान द्वारा संचालित अतिथि विश्राम गृह में फ़ोन द्वारा संपर्क किया (0734 -2551714) तो पता चला की वहां कोई कमरा खाली नहीं है. कुछ देर की मशक्कत के बाद अंततः हमने अपने रहने के लिए मंदिर के एकदम नजदीक ही स्थित एक प्राइवेट गेस्ट हाउस में एक कमरा दो दिनों के लिए बुक करा लिया. कमरा लेने के बाद हमने हाथ मुंह धोकर थोड़ी देर आराम किया तथा भोजन की तलाश में निकल गए. महाकाल मंदिर के मुख्य द्वार के सामने वाली वाली गली में कुछ भोजनालय हैं जहाँ खाना उपलब्ध है लेकिन खाने में निराशा ही हाथ लगी, खाना स्तरीय नहीं था.

गेस्ट हाउस में हमारा कमरा
अपनी क्षुधा शांत करने के बाद हम लोग वापस अपने गेस्ट हाउस में आ गए. कुछ देर बाद बाहर जा कर पता किया तो मालूम हुआ की रात 10 बजे भगवान् महाकाल की शयन आरती होती है, तो हम बिना देर किये मंदिर की ओर चल पड़े क्यों की हम जल्द से जल्द भगवन के प्रथम दर्शन कर लेना चाहते थे, लेकिन दुर्भाग्यवश हम गर्भगृह में प्रवेश नहीं कर पाए क्योंकि हमारे जाने के कुछ देर पहले ही गर्भगृह के कपाट बंद हो चुके थे. हम गर्भगृह के सामने हॉल में स्थित बेरीकेट्स में खड़े होकर शयन आरती में शामिल हुए, वहां से भी हमें भगवान् महाकालेश्वर के बड़े अच्छे दर्शन हुए. हॉल में कई सारे LCD टीवी भी लगे थे जिनसे गर्भगृह से आरती का प्रसारण किया जा रहा था.
मंत्रमुग्ध कर देने वाली शयन आरती के दौरान मंदिर का माहौल पूर्णतः शिवमय हो गया था तथा मानसिक स्थिति अध्यात्म के सर्वोच्छ शिखर पर पहुँच गयी थी. सचमुच वह अनुभव अविस्मरनीय था. शयन आरती के इस अद्भुत तथा अद्वितीय अनुभव के बाद हम गेस्ट हाउस की ओर अग्रसर हो गए इस आशा में की सुबह जल्दी आकर गर्भगृह में भगवान् के दर्शन तथा स्पर्श का मौका मिलेगा.
अगली सुबह हम फिर 6 :00 बजे उठकर नहा धोकर करीब 7 बजे मंदिर पहुँच गए, सुबह की आरती में शामिल हुए लेकिन दुर्भाग्य वश इस बार भी हमें गर्भगृह में प्रवेश का मौका नहीं मिला तथा बाहर से ही भगवान के दर्शन करके संतुष्ट होना पड़ा, लेकिन हम भी भगवान् के दर्शन के लिए बहुत जिद्दी हो जाते हैं, मैंने तथा कविता (मेरी जीवनसाथी) ने ठान लिया था की हम गर्भगृह से भगवान् के दर्शन कर के ही रहेंगे. भगवान् के नजदीक से दर्शनों की अपनी इस लालसा को पूरा करने की गरज से हम फिर रात को 9 :00 बजे मंदिर पहुँच गए तथा शयन आरती में शामिल हो गए (चूँकि हमारा गेस्ट हाउस मंदिर से कुछ ही कदमों की दुरी पर था अतः हम मंदिर आसानी से कुछ मिनटों में ही पहुँच जाते थे, मेरी हमेश यही कोशिश होती है की जहाँ भी हम धार्मिक यात्रा के लिए जाते हैं, अपने ठहरने की व्यवस्था मंदिर के जितना करीब हो सके करते है तथा साथी घुमक्कड़ भक्तों को भी मेरी यही सलाह है). आज ईश्वर हम पर मेहरबान थे तथा शयन आरती के तुरंत बाद ही गर्भगृह के पट खुले और हमें वो स्वर्णिम अवसर मिल गया जिसकी हमें तलाश थी, और हम गर्भगृह में पहुँच कर अपने भोले बाबा को स्पर्श करके, नमन करके अपना माथा उनके चरणों में रखकर आशीष लेकर प्रसन्न मन से मंदिर से बाहर आ गए और विशेष बात यह थी की ये तारीख 11 .11 .11 थी.
वैसे हम घर से भस्म आरती में शामिल होने के लिए मन बना कर ही आये थे, और यह बात निश्चित है की अगर आपको भस्म आरती में शामिल होने के लिए मंदिर प्रशासन से अनुमति पत्र (पास) प्राप्त हो जाता है तो गर्भगृह में प्रवेश तथा महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पर जल अभिषेक तथा स्पर्श करने का अवसर शत प्रतिशत निश्चित हो जाता है. अतः हमें अगले दिन सुबह 4 :30 बजे भस्म आरती के दौरान गर्भगृह में प्रवेश, नजदीक से दर्शन तथा स्पर्श का स्वर्णिम अवसर दूसरी बार प्राप्त हो गया.

महाकालेश्वर का प्रवेश द्वार

महाकाल मंदिर के सामने बाज़ार

पूजन सामग्री की दुकानें

कमल के फूल

महाकाल दर्शन के लिए कतार एवं पार्श्व में मंदिर

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में द्वादश ज्योतिर्लिंग ऐसे बारह प्राचीन तीर्थ स्थल हैं जिनका उल्लेख शिवपुराण में मिलता है, इन्हें ज्योतिर्लिंग कहा जाता है, क्योंकि बताया गया है की भगवान् शिव ने ज्योति के रूप में स्वयं को अपने भक्तों के समक्ष प्रकट किया था. आज भी यह कहा जाता है की भक्तों को उनके दर्शन इन स्थानों पर ज्योति के रूप में हुए.
पौराणिक कथाओं के अनुसार दूषण नामक एक दानव ने अवन्ती के निवासियों को परेशान किया और भगवान् शिव धरती से प्रकट हुए और उन्होंने दानव को परास्त कर दिया. तब अवन्ती के निवासियों के अनुरोध पर उन्होंने यहाँ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में अपना स्थाई निवास बना लिया.
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को स्वयंभू माना जाता है, जो अपने भीतर से शक्ति प्राप्त करता है जबकि अन्य मूर्तियों तथा लिंगों को सांस्कारिक तौर पर स्थापित किया गया है तथा उन्हें मंत्र शक्ति से सम्पन्न किया गया है
जैसा की पुराणों में कहा गया है-
आकाशे तारकं लिंगम, पाताले हाटकेश्वरमA
भूलोके च महाकाल, लिंगत्रय नमोस्तुतेAA
अर्थात, आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग हैं तथा प्रथ्वी पर महाकाल लिंग है यह तीनो लिंग ही अति पावन तथा मान्य हैं अतः तीनों लिंगों को नमन.
कहा जाता है:
अकाल मृत्यु वो मरे जो कर्म करे चांडाल काA
काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल काAA
श्री महाकालेश्वर, भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में एक तथा सर्वाधिक महत्व का ज्योतिर्लिंग है. महाकालेश्वर की ही वजह से उज्जैन हिन्दू धर्मं के प्रसिद्द तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है. महाकालेश्वर विश्व का एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिग है. यह एक अद्भुत विशेषता है जिसकी पुष्टि बारह ज्योतिर्लिंगों में से केवल महाकालेश्वर में पाई जाने वाली तांत्रिक परंपरा से होती है. महाकालेश्वर को उज्जैन के विशिष्ट अधिष्ठाता देवता के रूप में माना जाता है.
श्री महाकालेश्वर मंदिर के बारे में :
महाकालेश्वर मंदिर की महिमा का विभिन्न पुराणों में सजीवता से वर्णन किया गया है. महाकाल मंदिर का निर्माण 11 वीं शताब्दी में किया गया था, 140 वर्षों के बाद इल्तुतमिश ने इसे तोड़ दिया था तथा वर्त्तमान मंदिर मराठा कालीन माना जाता है जिसे लगभग 250 वर्ष पूर्व बाबा रामचंद्र शेन्वी ने बनवाया था. मंदिर के गर्भगृह के पश्चिम, उत्तर तथा पूर्व में क्रमशः गणेश, माँ पारवती तथा कार्तिकेय की मूर्तियाँ स्थापित हैं. दक्षिण में नंदी की मूर्ति है. यह मंदिर तीन खण्डों में विभक्त है। निचले खण्ड में महाकालेश्वर बीच के खण्ड में ओंकारेश्वर तथा सर्वोच्च खण्ड में नागचन्द्रेश्वर के शिवलिंग प्रतिष्ठित हैं। नागचन्द्रेश्वर के दर्शन केवल नागपंचमी को ही होते हैं। मन्दिर के परिसर में जो विशाल कुण्ड है, वही पावन कोटि तीर्थ है। इसके तीनों ओर लघु शैव मन्दिर निर्मित हैं। कुण्ड सोपानों से जुड़े मार्ग पर अनेक दर्शनीय परमारकालीन प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं जो उस समय निर्मित मन्दिर के कलात्मक वैभव का परिचय कराती है। कुण्ड के पूर्व में जो विशाल बरामदा है, वहाँ से महाकालेश्वर के गर्भगृह में प्रवेश किया जाता है। इसी बरामदे के उत्तरी छोर पर भगवान्‌ राम एवं देवी अवन्तिका की आकर्षक प्रतिमाएँ पूज्य हैं।

महाकाल मंदिर

महाकाल मंदिर अन्य द्रश्य

महाकाल मंदिर रात में

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

महाकाल परिसर में एक अन्य मंदिर

परिसर में स्थित श्री स्वप्नेश्वर महादेव मंदिर

परिसर में स्थित श्री सिद्धि विनायक मंदिर

परिसर में श्री बाल हनुमान मंदिर

एकादश रूद्र महादेव
श्री महाकालेश्वर मंदिर में आयोजित होनेवाली दैनिक आरतियों की समय सारणी:
भस्मार्ती
प्रात: 4 बजे श्रावण मास में प्रात: 3 बजे महाशिवरात्रि को प्रात: 2-30 बजे।
दध्योदन आरती
चैत्र से आश्विन तक प्रात: 7 से 7-45 तक, कार्तिक से फाल्गुन तक प्रात: 7-30 से 8-15 तक
महाभोग आरती
चैत्र से आश्विन तक प्रात: 10 से 10-45 तक कार्तिक से फाल्गुन तक प्रात: 10-30 से 11-15 तक
सांध्य आरती
चैत्र से आश्विन तक संध्या 5 से 5-45 तक कार्तिक से फाल्गुन तक संध्या 5-30 से 6-15 तक
पुन: सांध्य आरती
चैत्र से आश्विन तक संध्या 7 से 7-45 तक कार्तिक से फाल्गुन तक संध्या 6-30 से 7-15 तक
शयन आरती
चैत्र से आश्विन तक रात्रि 10:30 बजे कार्तिक से फाल्गुन तक रात्रि 11-00 बजे
भस्म आरती : एक अनोखी परंपरा
भगवान् महाकाल की विभिन्न पूजाओं तथा आरतियों में भस्म आरती का अपना अलग महत्व है. यह अपने तरह की एकमात्र आरती है जो विश्व में सिर्फ महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन में ही की जाती है. हर शिवभक्त को अपने जीवन में कम से कम एक बार भगवान महाकालेश्वर की भस्म आरती में जरुर शामिल होना चाहिए.
महाकाल मंदिर में आयोजित होने वाले विभिन्न दैनिक अनुष्ठानों में दिन का पहला अनुष्ठान होता है भस्म आरती जो की भगवान शिव को जगाने, उनका श्रृंगार करने तथा उनकी प्रथम आरती करने के लिए किया जाता है, इस आरती के बारे में विशेष यह है की यह आरती प्रतिदिन सुबह चार बजे, श्मशान घाट से लायी गयी ताजी चिता की राख से महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पर छिड़काव करके की जाती है. सर्वप्रथम सुबह चार बजे भगवान् का जलाभिषेक किया जाता है , तत्पश्चात श्रृंगार तथा उसके बाद ज्योतिर्लिंग को चिता भस्म से सराबोर कर दिया जाता है. शास्त्रों में चिता भस्म अशुद्ध माना गया है. चिता भस्म का स्पर्श हो जाये तो स्नान करना पड़ता है परन्तु भगवान शिव के स्पर्श से भस्म पवित्र होता है क्योंकि शिव निष्काम है, उन्हें काम का स्पर्श नहीं है.
शिवमहिम्नस्तोत्रम के अनुसार:
चिताभस्मोलेप स्त्रगापी न्रक रोतिपरीक: अमगाल्या शिव तव भवतु नामैवमखिल तथापि स्मर्तना वरद परम मंगल्मसी ।
हालाँकि चिता भस्म की बात कहाँ तक सत्य है कोई नहीं जानता, मंदिर प्रशासन का वक्तव्य है की पूर्व में यह आरती ताज़ी चिता की राख से ही होती थी लेकिन वर्त्तमान समय में चिता की राख की जगह कंडे की राख का इस्तेमाल होता है. जबकि उज्जैन के स्थानीय निवासियों मानना है की आज भी भस्म आरती ताज़ी चिता की राख से ही सम्पन्न होती है.
यह एक रहस्यमयी, अस्वाभाविक तथा सामान्य अनुष्ठान है तथा पुरे विश्व में केवल उज्जैन महाकाल मंदिर में ही किया जाता है.
भस्म आरती सुबह चार बजे से छः बजे के बिच में की जाती है तथा इसमें शामिल होने के लिए एक दिन पूर्व मंदिर प्रशासन को आवेदन पत्र देकर अनुमति पत्र हासिल किया जाता है उसके बाद ही आप भस्म आरती में शामिल हो सकते हैं.
अनुमति पत्र तभी हासिल किया जा सकता है जब आपके पास अपने फोटो परिचय पत्र की मूल प्रति हो. आरती के एक दिन पूर्व अनुमति पत्र प्राप्त करने के बाद सुबह 2 से 3 बजे के बिच भस्म आरती की लाइन में लगना होता है तब करीब चार बजे भक्त को मंदिर में प्रवेश दिया जाता है. मंदिर में प्रवेश के वक्त एक बार फिर फोटो परिचय पत्र दिखाना होता है
इस आरती में शामिल होने के लिए पुरुषों को सिर्फ धोती और महिलाओं को साड़ी में ही प्रवेश दिया जाता है अन्यथा अनुमति पत्र स्वतः ही निरस्त हो जाता है.

भस्म आरती के लिए सुबह 2 .30 बजे भक्तों की कतार
भस्म आरती के दौरान जब ज्योतिर्लिंग पर भस्म न्यौछावर की जाती है उस द्रश्य को देखना महिलाओं के लिए वर्जित है अतः उस समय महिलाओं को घूँघट करना अनिवार्य होता है (कुछ मिनटों के लिए). भस्म आरती से सम्बंधित सूचनाएं तथा नियम निचे निचे दिए गए चित्रों में वर्णित हैं.

भस्म आरती सम्बंधित सूचना

भस्म आरती नियम तालिका
तो यह थी एक संक्षिप्त जानकारी उज्जैन शहर, भगवान् महाकाल, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर तथा भस्म आरती के बारे में. अब मैं अपनी इस पोस्ट को यहीं विराम देता हूँ तथा अगली कड़ी में आपलोगों को रबरू करूँगा उज्जैन शहर के अन्य मंदिरों से. तब तक के लिए …..हैप्पी घुमक्कड़ी.